International Journal of Multidisciplinary Education and Research


ISSN: 2455-4588

Vol. 5, Issue 1 (2020)

अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा का दुर्खीम के सदर्भ में व्याख्यात्मक अध्ययन

Author(s): सतीष कुमार
Abstract: अपराध एक सामाजिक समस्या है, जो समाज के लिए हानिकारक है। समाज के द्वारा अपराध को समाप्त करने के प्रयास किये जाते हैं। परन्तु अपराध अपना रूप बदल लेता है और समाज से समाप्त नही होता है। प्रसिद्व समाजषास्त्री दुर्खीम अपराध को समाज में एक सामान्य और प्रकार्यवादी मानते है। अपराध के सामान्य पहलू को समझाते हूए कहते है कि समाज अपराध से मुक्त नही हो सकता है, क्योकि समाज में विभिन्न चेतना के व्यक्ति होते है। जिसके कारण कुछ व्यक्ति समाज के नियमों के विपरित आचरण करते है। जिन आचरणों को समाज ने अपराध परिभाषित कर रखा है। दुर्खीम अपराध के प्रकार्यवादी पहलू को समझाते हूए कहते है कि अपराध सामाजिक परिवर्तन के लिए आवष्यक पूर्वापेक्षित दषा है। उनका मानना है कि कई बार नकारात्मक विचलन भी समाज के लिए आवष्यक होता है। वेे महान दार्षनिक सुकरात के उदाहरण से समझाते हूए कहते है कि उनका अपराध विचारो की स्वतंत्रता था जो उस समय में अपराध था। परन्तु उनका यह अपराध युनान के समाज के परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। दुर्खीम के अनुसार अपराध समाज में समाजिक परिवर्तन के लिए आवष्यक है और एक निरंतर बनी रहने वाली सामाजिक समस्या है। वे कहते है कि अपराध समाज के लिए नकारात्मक भी है और सकारात्मक भी है। अतः अपराध समाज का अंग बन चुका है।
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