International Journal of Multidisciplinary Education and Research


ISSN: 2455-4588

Vol. 4, Issue 5 (2019)

अद्वैत वेदान्त दर्शन की तत्त्वमीमांसा डाॅ. मुकेश कुमार

Author(s): डाॅ. मुकेश कुमार
Abstract:
शंकर ने जिस सिद्धान्त का प्रवर्तन किया उसको अद्वैत वेदान्त कहा जाता है जिसका आधार प्रस्थानत्रयी (गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र) है। शंकर ने ब्रह्मतत्त्व को परमतत्त्व के रूप में स्वीकार किया है और यही परमतत्त्व अनेक रूपों में प्रतिभासित हो रहा है। जीव, जगत आदि का आभास कराने वाली ब्रह्म की अनादि शक्ति का नाम माया है इस माया शक्ति के द्वारा ही ब्रह्म, जीव, जगत और ईश्वर के रूप में स्वयं को प्रकट करता हुआ-सा प्रतीत होता है। इस माया शक्ति के द्वारा ही जीव-ब्रह्म का भेद, जीव-जीव का भेद, जीव-ईश्वर का भेद प्रतीत होता है। अतः इस भेद की प्रतीति मायाजनित या अज्ञानमूलक है। इस माया या अज्ञान शक्ति के द्वारा ही जीव को बंधन की प्रतीति होती है और वह जन्म-मृत्यु के चक्र में फंस जाता है। यह जीव विवेक वैराग्य, शटसम्पत्ति और मुमुक्षा से संपन्न होकर जब किसी श्रोत्रिय ब्रह्मनिश्ठ गुरु की शरण में जाता है तब वह गुरु की प्रसन्नता से श्रवण-मनन और निदिध्यासन आदि साधनों से ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार करता है और जीवनमुक्त हो जाता है तथा मरणोपरांत विदेहमुक्त होकर परमगति को प्राप्त हो जाता है। शंकर के इन तत्त्वमीमांसीय विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि शंकर ने ब्रह्म की सत्ता को एकमात्र पारमार्थिक सत्ता के रूप में ग्रहण किया है और जीव, जगत को व्यावहारिक सत्ता और स्वप्न भ्रमादि को प्रातिभासिक सत्ता के रूप में ग्रण किया है। शंकर के सिद्धांत की पुष्टि में एक श्लोक प्रचलित है -
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