International Journal of Multidisciplinary Education and Research

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ISSN: 2455-4588

Vol. 1, Issue 4 (2016)

बाथौ धर्म में ‘खेराई उत्सव’ बोड़ो जनजातियों का धार्मिक एवं आध्यात्मिक विश्वासः एक विश्लेषणात्मक अध्ययन (असम प्रांत के विशेष सन्दर्भ में)

Author(s): जयन्त कुमार बोरो
Abstract: धर्म और दर्शन सभी मानव जातियों की अपनी एक खास तरह की होती है। जातियों के विकास में सभ्यताए संस्कृति और परम्परा के निर्वाह की आवश्यकता होती है। वर्तमान काल में बोड़ो समाज अपने प्राचीन धर्म, दर्शन और परम्परा को मानते हुये अपने संस्कृति को जीवित किये रखा है। बाथौ बोड़ो समाज का प्रधान देवता एवं धर्म है। बाथौ धर्म के अन्तर्गत कई प्रकार के उत्सवों का आयोजन किया जाता है। जिसमें से एक खेराई उत्सव है। खेराई उत्सव हो या अन्य उत्सव वेसारे कृषि से ही सम्बन्धित होते है। खेराई उत्सव बोड़ो ध्रर्म के अन्तर्गत मनाया जाने वाला एक विस्तृत एवं खर्चीला पूजा विधान है। खेराई उत्सव में नर्तकी, ओझा या पुरोहित, वाद्य यन्त्र, औजार आदि काफी चीजों की आवश्यकता होती है। उत्सव के आयोजन के दौरान उक्त सभी वस्तुयें अपनी भूमिका का निर्धारित करता है। खेराई एक बलि विधान से सम्बन्धित उत्सव है इसमें कई सारे जीव-जन्तुओं की देवताओं को प्रसन्न करने के फलस्वरुप उनकी बलि दी जाती हैं। ओझा (पुरोहित) इस उत्सव के समय दैवधुनि को विशेष प्रकार से प्रयोग में लाते है कि क्योकि ऐसी धारणा है कि दैवधुनि के माध्यम से वह (पुरोहित) देव-देवियों के साथ सम्वाद को स्थापित करता है। ताकि उन्हें धरती पर आवाहन कर समस्त मानव जाति में शांति और प्रसन्नता के वातावरण को प्रवाहित किया जा सके। यह उत्सव एक प्रकार से प्रकृति के साथ विशेष रुप से जुरा हुआ है। इस उत्सव के माध्यम से जिन-जिन देवताओं की पूजा की उनमें से प्रायः प्रकृति की शक्ति के रुप ग्रहण किया जा सकता है।
Pages: 22-29  |  855 Views  357 Downloads
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